Thursday, 15 February 2018

मेरी दुनिया ऐसी भी










मेरी दुनिया ऐसी भी



धड़कनों को रोक चुका हूँ।
बस तुझमें खुद को झोंक चुका हूँ।
दिल मुसकिल मे हैं।
क्योंकि तू मेरे दिल में है।
ख्वाब मेरे मुसकुराने लगे है।
मुझी से नजरें चुराने लगे हैं।
जैसे उन्हें नया नया ,मुझ से ,इश्क हुआ है।
रिश्ता नहीं है कुछ भी, फिर भी कह रही हैं, कुछ हुआ है।
पर बहुत अच्छा है सब,है जिन्दगी जैसी भी।
मेरी दुनिया ऐसी भी।
अब जिन्दगी को जरा समझने लगा हूं।
पहले लड़खड़ा कर गीर जाता था, अब जरा संभलने लगा हूं।
हा आज भी तेरी याद उतनी ही आती है।
हा आज भी हर सुबह रोता हूं, जब तू चली जाती हैं।
हा आज भी मेरी लगभग हर रचना में तेरा जिक्र होता हैं।
हा आज भी मुझे तेरी फिक्र होती हैं।
तुम पढ़ना , हो कविता मेरी जैसी भी ।
मेरी दुनिया ऐसी भी।
                                    
                                          -रवि वर्मा

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