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| Ravi Verma |
मेरी जिंदगी,
मुझे रूलाना चहती हैं।
तभी जो मेरी कभी नहीं हो सकती,
उसे मांगती हैं।
पर कैसे समझाऊँ इसे,
कुछ खुशियों के लिए, नहीं हूं मै बना।
तभी जहां से जरा दूरी पर हूं,मैं खड़ा।
सवालों के आशियाने मे,
दूर हूं जवाबों से।
जरा अधुरा ही सही,
मै जो अब मैं नहीं।
मुझे जख्मों कि आदत है,
तभी जानता हू जीत है,तए।
कुछ दूर ही सही इश्क कि सीढियां,
हूं मै चढ़ा।
तभी जहां से जरा दूरी पर हूं मैं खड़ा।
-रवि वर्मा(इश्क)

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