
प्रथम पूज्यनीय देवता, नमन आपको है हमारा।
दुख हरते हैं आप सभी के, बन कर जीवन का सहारा।
सौ सूर्य के बराबर, ज्ञान आपके पास है।
जो भटका हुआ है, जग में, उसके आप ही आस हैं।
विधिवत पूजा करें आपकी, आपको भोग लगाते हैं।
आपके प्रसाद को पा कर, भक्त प्रसन्न हो जाते हैं।
सेवा करते हम भी आपकी, बनके छोटे से दास हैं।
जो भटका हुआ है, जग में, उसके आप ही आस हैं।
ना मांगूं धन वैभव तुमसे, बस ज्ञान का दिपक जला रहे।
केवल खुशियां ही खुशियां हो, भक्त, रवि जहां भी चला करे।
सर्वस्व लूटा दूं, इस धरती पर, जितना भी मेरे पास है।
जो भटका हुआ है, जग में, उसके आप ही आस हैं।
-रवि वर्मा
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