जिक्र तुम्हारा हुआ करेगा।
हम रहें या नहीं रहें, उसे तो सब पढ़ेंगे,
जो भी जग में रहेगा।
चाहता हूं तुम कली से अब,
फूल बन कर खिल जाओ।
मै बहुत हो सकता हूं,
अगर तुम जरा सा मिल जाओ।
शामें अब भी मुस्काती है,
न जाने क्यों मुझे देख कर।
क्या वो भी अब चाहती हैं,
हम दोनों का हो एक घर।
मैं इतनी खुशियां दे दूं तुम्हें कि,
तुम कभी न गिन पाओ।
मैं बहुत हो सकता हूं,
अगर तुम जरा सा मिल जाओ।
चलो फैसला,
तुम पर छोड़ा।
सोच सको तो,
सोचो थोड़ा।
कभी नहीं जो कोई लाया,
तुम ऐसा, एक दिन लाओ।
मै बहुत हो सकता हूं,
अगर तुम जरा सा मिल जाओ।
~रवि वर्मा

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