Saturday, 9 May 2020

वो कुर्बानियों की, एक किताब लिखती है


Ravi Verma
जब भी जीवन की कश्ती,
मझधार में फंसती है।
जब विपदाएं हावी हो कर,
सिर पर हंसती है।
तब सामने जो भगवान की छवि में दिखती है।
वो कुर्बानियों की, एक किताब लिखती है।
भूल कर अपनी हर खुशी,
हर पल सेवा में लगी रहती है।
उसका हाल जो पूछो कभी,
खुश हूं, हर हमेशा कहती है।
बहाने की गाड़ी बस उसी के सामने टिकती है।
वो कुर्बानियों की, एक किताब लिखती हैं।
संस्कार और मर्यादा का,
हरदम पाठ पढ़ाती है।
तुम कितने भी बड़े हो जाओ,
तुम्हें बच्चा ही बताती है।
ज्ञान और बस ज्ञान है उसके अंदर,
फिर भी हरदम सीखती हैं।
वो कुर्बानियों की, एक किताब लिखती है।
~रवि वर्मा

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