जरूरत से ज्यादा विशाल हो।
अपने घर में,
सबको जगह देते हो।
इतना कुछ है तुम में कि,
तुम जीने की वजह देते हो।
शायद ही कोई होगा जिसका,
तुम्हारे साथ, वक्त नहीं बीता है।
समुद्र तुम से, बहुत कुछ सीखा है।
चांद हो या सूरज,
सभी के साथ निखरते हो।
परिस्थितियां कैसी भी हो,
तुम नहीं बिखरते हो।
तुम वो हो जो, बहते नहीं हो।
केवल कर्म करते हो, कुछ कहते नहीं हो।
तुम्हारे तुल्य तो केवल राम और सीता हैं।
समुद्र तुम से बहुत कुछ सीखा है।
©रवि वर्मा

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